🔱 श्रुति-संरक्षणाय समर्पितम् 🔱

वेद, अग्निहोत्र एवं श्रौत परंपरा का संरक्षण

« गेहे गेहे द्विजातीनामग्निहोत्रं सदा भवेत् »

श्रौत एवं अग्निहोत्र

श्रौत क्या है

चूंकि वेद (मन्त्र + ब्राह्मण) अनादि काल से गुरुमुख से श्रवण कर पुनः उसी प्रकार का उच्चारण कर रक्षित किये जा रहे हैं अतः वेद को श्रुति कहते हैं। श्रुति के द्वारा जो कर्म साक्षात् प्रतिपादित किये जाते हैं उन कर्मो को श्रौत कर्म कहते हैं। जैसे — अग्निहोत्र, दर्श, पौर्णमास, आग्रायण, चातुर्मास्य, निरूढपशुबन्ध, सोम आदि।

अग्निहोत्र क्या है

विवाह के समय या उसके पश्चात् पहले गृह्याग्नि का ग्रहण होता है। उसके उपरान्त श्रौत अग्नि का आधान होता है — जिनके नाम हैं — गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि। इन तीन अग्नियों में प्रतिदिन सायं प्रातः वेदोक्त विधि से जो होम होता है उसे अग्निहोत्र कहते हैं। ये अग्नि आधान काल से लेकर जीवन पर्यन्त यजमान के गृह में रहते हैं।

इन्हीं तीनों अग्नियों में अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त सभी यज्ञ होते हैं।

अग्निहोत्र की अनिवार्यता इसी से समझी जा सकती है कि सूतक काल में सभी शास्त्रीय कर्म जैसे सन्ध्या आदि का निषेध हो जाता है परन्तु अग्निहोत्र चलता ही रहता है। अग्निहोत्री अग्निहोत्र के लिए सूतक रहित होता है।

भगवान् राम के राज्य में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो अग्निहोत्री न हो और जिसने कोई सोमयाग आदि न किया हो। इसी से भगवान् राम का राज्य सर्वसुख सम्पन्न था। क्योंकि श्रीभागवत में कहा गया है — धनमिच्छेत् हुताशनात्। अन्यत्र सुखमिच्छेत् हुताशनात्। अर्थात् धन और सुख की इच्छा अग्नि नारायण से करनी चाहिए।

हमारे बारे में

वैदिक ग्रन्थ एवं दीप
"यज्ञेन वै देवा दिवं गताः" — वेदों में वर्णित यज्ञ परंपरा का संरक्षण हमारा ध्येय।

श्री कात्यायन श्रौत वेद संवर्धन न्यास वैदिक श्रौत परंपरा, अग्निहोत्र एवं वेदाध्ययन के संरक्षण हेतु समर्पित है। गुरु परंपरा और श्रुति आधारित ज्ञान के प्रचार द्वारा हम सनातन संस्कृति का उत्थान चाहते हैं।

वेद पाठशालाओं को संरक्षण, अग्निहोत्र का प्रसार तथा विद्वानों के सहयोग से हम समाज के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विकास में योगदान देते हैं।

और जाने

हमारा उद्देश्य

अग्निहोत्र संरक्षण

वैदिक अग्निहोत्र एवं श्रौत यज्ञों की परंपरा को जीवित रखना।

वेद शाखा संवर्धन

वैदिकाध्ययन एवं वेद पाठशालाओं को संरक्षण एवं समर्थन प्रदान करना।

गुरु परंपरा संरक्षण

श्रुति-परंपरा आधारित ज्ञान का प्रचार एवं सांस्कृतिक उत्थान।

संस्थापक

संस्थापक महोदय

परमपूज्य ऋषिकल्प चतुर्वेद श्री ६ विन्ध्येश्वरी प्रसाद शुक्ल

संस्थापक, श्रौत यज्ञ संवर्धन न्यास

वैदिक श्रौत परंपरा एवं अग्निहोत्र के संरक्षण हेतु यह न्यास समर्पित है। गुरु परंपरा से प्रेरित होकर हम वेद, यज्ञ एवं सनातन संस्कृति के उत्थान में योगदान देने का प्रयास करते हैं।

अध्यक्ष

अध्यक्ष महोदय

सोमयाजी पं० श्रीराम द्विवेदी

अध्यक्ष, श्रौत यज्ञ संवर्धन न्यास

पुराणों के अद्भुत ज्ञाता परमपूज्य स्वामी श्री विष्णु प्रपन्नाचार्य के कनिष्ठ पुत्र के रूप में पं० श्रीराम द्विवेदी जी का जन्म हुआ । आपने बाल्यकाल मे ही अपने पूज्य पिता जी से ही व्याकरण व वेद का प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त किया ।
तथा 8 वर्ष में उपनयन के पश्चात् 25 वर्ष में समावर्तन पर्यन्त वेद वेदांग का विभिन्न गुरुजनों से अध्ययन किया । परम पूज्य ऋषिकल्प श्री६ विन्ध्येश्वरी प्रसाद शुक्ल (श्री ब्रह्मचारी गुरु जी) की कृपा से आपने कल्पसूत्र का अध्ययन कर श्रौत कर्म का ज्ञान प्राप्त किया ।

न्यास सदस्य

न्यास के संरक्षक (मार्गदर्शक) तथा पदाधिकारी (कार्यकारिणी) निम्नलिखित हैं।

संरक्षक — मार्गदर्शक

जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री राघवाचार्य स्वामी

जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री राघवाचार्य स्वामी

श्रीरामललासदन ट्रस्ट के अध्यक्ष परमपूज्य स्वामी श्री६ राघवाचार्य जी महाराज ने सविधि ब्रह्मचारी वेश में परमपूज्य श्री ब्रह्मचारीगुरुजी से षडङ्ग वेद का अध्ययन किया तथा मुख्यतया स्वशाखा सामवेद कौथुम शाखा का किया है । आपकी शास्त्रों में अलौकिक प्रतिभा है जिसके सम्मुख सम्पूर्ण देश विदेश नत मस्तक है आपकी विनम्रता सरलता अगाध विद्वत्ता सबको आकृष्ट करती है । परमपूज्य श्री ब्रह्मचारीगुरुजी आपको अपने पुत्र तुल्य मानते थे । आज आप रामायण भागवत आदि कथा के माध्यम से वैदिक कर्मो के प्रति जनमानस मे निष्ठा जगाते हुए भगवद्भक्ति का विस्तार कर रहे हैं । आपकी श्रौत कर्म में अत्यन्त निष्ठा है । आपने कई श्रौतइष्टियों में आर्त्विज्य किया है ।
आपने अनेक पुस्तकों का सम्पादन व लेखन कार्य किया है जिससे सामान्य जनता व विद्वत्समाज दोनो लाभान्वित हुए हैं।

परमपूज्य श्री बालकृष्णाचार्य स्वामी

परमपूज्य श्री बालकृष्णाचार्य स्वामी

परमपूज्य स्वामी श्री बालकृष्णाचार्य जी ने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक परमपूज्य गुरुदेव शिवावतार चतुर्वेद स्वनामधन्य पं० श्री६ विन्ध्येश्वरी प्रसाद शुक्ल ( श्री ब्रह्मचारी गुरुजी ) से शुक्ल यजुर्वेद भाष्य शतपथब्राह्मण कात्यायन श्रौतसूत्र ऋग्वेद भाष्य प्रभृति ग्रन्थों का अध्ययन किया है तथा वर्तमान में श्रीअयोध्याधामस्थ सप्तसागर के श्री वेंकटेशमन्दिर (श्री नेपाली मन्दिर ) के अध्यक्ष के रूप में भगवत् कैंकर्य करते हुए अध्ययन अध्यापन से सबको कृतार्थ कर रहे हैं। आपकी गोभक्ति ब्राह्मणभक्ति भगवद्भक्ति तथा वेदोक्तकर्म मे निष्ठा अतुलनीय है । आपके महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि परमपूज्य श्री ब्रह्मचारी गुरुजी आपको अपना प्रतिनिधि स्वीकार किया करते थे । आपके जैसे सन्त विद्वान् गोभक्त अत्यन्त दुर्लभ हैं। आपका जीवन अत्यन्त सरल, शास्त्रबद्ध एवं सबके लिए अनुकरणीय है ।

परमपूज्य श्रीसंजयपाण्डेयः

परमपूज्य श्रीसंजयपाण्डेयः

परमपूज्य गुरुदेव शिवावतार चतुर्वेद स्वनामधन्य पं० श्री६ विन्ध्येश्वरी प्रसाद शुक्ल ( श्री ब्रह्मचारी गुरुजी के भागिनेय सर्वशास्त्रनिष्ठ कर्मठ श्रेष्ठ श्री सञ्जयपाण्डेय जी ने अपने मातुल ( श्री ब्रह्मचारी गुरुजी ) के श्री चरणों में ही सविधि मेखला कृष्णाजिन दण्ड युक्त रहकर षडङ्ग चारो वेदों का अध्ययन किया तथा नैष्ठिक ब्रह्मचर्य व्रत को धारणकर अपना सम्पूर्ण काल वेद के अध्ययन अध्यापन में समर्पित कर वर्तमान में श्री अयोध्या धाम विराजकर शताधिक छात्रों को शतपथ कात्यायन आदि जटिल विषयों का निःस्वार्थ भावेन सप्रयोग अध्यापन करा रहे हैं ।
आपकी सरलता दयालुता तथा रोचक अध्यापन शैली आपको अत्यन्त विशिष्ट बनाती है ।आपके अनेक छात्र श्रौतकर्म के प्रकाण्ड पण्डित हैं ।

परमपूज्य श्री अम्बिकादत्तशुक्ल:

परमपूज्य श्री अम्बिकादत्तशुक्ल:

परमपूज्य श्री ब्रह्मचारी गुरु के परमप्रिय शिष्य जिन्हे गुरुजी अपना अनुज ही मानते उन स्वनामधन्य गृह्याग्नि धारक परमपूज्य पं० श्री रामतेजशुक्लः जी के पुत्र
पं० श्री अम्बिकादत्तशुक्लः जी ने उपनयन के पश्चात् बह्मचारी वेशभूषा मे द्वादशाधिक वर्षो में षडङ्ग चारो वेद का अध्ययन किया । आप स्वभाव से अत्यन्त सरल निःस्वार्थ अध्यापन कार्य में रुचि रखने वाले हैं आपका प्रायः समय चारो वेदों का परायण एवं उनके अध्यापन में ही जाता है । श्रौतविद्या में आप अत्यन्त निष्णान्त हैं । आपके मार्गदर्शन में अनेक छात्रो ने श्रौत स्मार्त कर्म में कुशलता प्राप्त की है । आपने अनेक सोमयागों में आर्त्विज्य किया है।आपके उदारतापूर्वक विद्या दान की ख्याति सम्पूर्ण अयोध्या मे है ।

परमपूज्य सोमयाजी श्री ज्ञानेन्द्र सापकोटा

परमपूज्य सोमयाजी श्री ज्ञानेन्द्र सापकोटा

परमपूज्य श्रीब्रह्मचारी गुरुजी के शिष्यपरम्परा में श्री६ ज्ञानेन्द्र साप्कोटा व्याकरण न्याय मीमांसा तथा श्रौत के प्रकाण्ड विद्वान् हैं । आप के पिता जी भी अग्निहोत्री हैं आप न्याय मीमांसा श्रौत के विभिन्न विषयों का अध्यापन करते हुए वर्तमान में सम्पूर्णानन्द संस्कृतविश्व विद्यालय में अध्यापक पद पर कार्य रत हैं । आपने अनेक श्रौतग्रन्थों का सम्पादन किया है जिससे शुक्लयजुर्वेद के श्रौत प्रक्रिया के अध्ययन में सरलता आयी है । आपका विद्याप्रेम अत्यन्त अद्भुत है । आपके अनेक छात्र श्रौतकर्म के प्रकाण्ड पण्डित हैं । आपने अनेक सोमयाग में ब्रह्मत्व अध्वर्यु आदि का दायित्व वहन किया है।

पदाधिकारी — कार्यकारिणी

श्रीयुवराजमिश्रः
उपाध्यक्षः

श्रीयुवराजमिश्रः

परमपूज्य पं० श्री६ युवराजमिश्र जी का जन्म गंगा यमुना के मध्य में स्थित कौशाम्बी जनपद के भगवान् श्रीराम के विश्रामस्थल के रूप में प्रसिद्ध चरंवा नामक ग्राम में हुआ है । आप सन्त शिरोमणि परमपूज्य श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से वैष्णवी दीक्षा प्राप्त कर उनके आज्ञा से श्रुति अध्ययन हेतु श्री अयोध्या धाम में परमपूज्य श्री ब्रह्मचारी गुरुजी के श्री चरणकमलों का समाश्रयण किया तथा सविधि षडङ्ग वेद का अध्ययन कर श्रौत कर्म में अत्यन्त निपुणता प्राप्त की है ।आपने अनेक सोमयागों में अध्वर्यु पद का निर्वहण किया है। आपकी नवनवोन्मेष शालिनी प्रतिभा सबको चमत्कृत करती है आपकी शास्त्र प्रतिपादन शैली तथा गूढ तत्त्व प्रकाशन शैली अत्यन्त मनोरम है जिसे सुनकर बड़े बड़े विद्वान् आश्चर्य चकित हो जाते

श्रीअंकितमिश्रः
कोषाध्यक्षः

श्रीअंकितमिश्रः

परमपूज्य पं० श्री६ अङ्कित मिश्र जी का जन्म गंगा यमुना के मध्य में स्थित कौशाम्बी जनपद के भगवान् श्रीराम के विश्रामस्थल के रूप में प्रसिद्ध चरंवा नामक ग्राम में हुआ है । आपसन्त शिरोमणि परमपूज्य श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से वैष्णवी दीक्षा प्राप्त कर उनके आज्ञा से श्रुति अध्ययन हेतु श्री अयोध्या धाम में परमपूज्य श्री ब्रह्मचारी गुरुजी के श्री चरणकमलों का समाश्रयण किया तथा सविधि षडङ्ग वेद का अध्ययन कर श्रौत कर्म में अत्यन्त निपुणता प्राप्त की है । आपने अनेक सोमयागों में होता पद का निर्वहण किया है। आपकी उदारता गुरुभक्ति शास्त्रनिष्ठा विद्वत्ता की जितनी भी प्रशंसा की जाय वह स्वल्प ही होगा ।

परमपूज्य सोमयाजी श्री अरविन्द पाण्डेयः
महामन्त्री

परमपूज्य सोमयाजी श्री अरविन्द पाण्डेयः

परमपूज्य गुरुदेव शिवावतार चतुर्वेद स्वनामधन्य पं० श्री६ विन्ध्येश्वरी प्रसाद शुक्ल ( श्री ब्रह्मचारी गुरुजी के भागिनेय सर्वशास्त्रनिष्ठ कर्मठ श्रेष्ठ श्री अरविन्द पाण्डेय जी ने अपने मातुल ( श्री ब्रह्मचारी गुरुजी ) के श्री चरणों में ही शास्त्र अध्ययन कर उन्ही के सान्निध्य में व्रात्यस्तोम करके सोमाधान पूर्वक अग्निहोत्रव्रत को धारण कर अपनी प्रखर वाक् पटुता से अग्निहोत्र का प्रचार प्रसार करते हुए वर्तमान में उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जनपद के परिगंवा नामक ग्राम को अपनी उपस्थिति से धन्य कर रहे हैं । आपकी शास्त्रनिष्ठा, गुरुचरणों मे निष्ठा, अग्निहोत्र मे निष्ठा अनुपम है ।

श्रीप्रकाशपाण्डेयः
मुख्यसचिवः

श्रीप्रकाशपाण्डेयः

श्रीप्रकाशपाण्डेय जी ने परमपूज्य श्रीब्रह्मचारी गुरुजी से प्रभावित होकर श्रीगुरुचरणों मे ही वेदाध्ययन प्रारम्भ किया । आपकी श्रौतविद्या मे अत्यन्त रुचि रही है । आपने अनेक इष्टियों मे हौत्र किया तथा अनेक सोमयागों मे भिन्न भिन्न ऋत्विक् पद पर कार्य किया है । आप विद्याव्यसनी होने के साथ-साथ अत्यन्त दृढ स्वभाव के हैं । आपने शतशः छात्रों को वेदाध्ययन करने हेतु प्रेरित कर उन्हे वेद की प्रायः सभी शाखाओं के अध्ययन हेतु भारतवर्ष के विभिन्न पाठशालाओं में भेजा वे अधीत छात्र आज वेदभगवान् के अध्यापन मे रत होकर उत्तर भारत में जागृति उत्पन्न कर रहे हैं । श्रीप्रकाशपाण्डेय जी वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में अतिथि अध्यापक का दायित्व वहन करते हुए छात्रों को वेद मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित कर रहे हैं।

परमपूज्य पं० श्री पंकजपाण्डेयः (सामवेदी जी) ( सामवेदविषयक परामर्शदाता)
संरक्षक

परमपूज्य पं० श्री पंकजपाण्डेयः (सामवेदी जी) ( सामवेदविषयक परामर्शदाता)

पं० श्री पंकजपाण्डेय जी के ऊपर परमपूज्य श्री ब्रह्मचारी गुरुजी का अत्यन्त वात्सल्य था जिसका प्रमुख कारण था पंकजपाण्डेय का सामवेदज्ञ होना । आपने श्री गुरु जी की सन्निधि मे ही उपनयन के पश्चात् अध्ययन प्रारम्भ किया पुनः वाराणसी में श्री गुरुजी के ही परम प्रिय शिष्य तथा सं० सं० वि०वि० में पञ्चांग विभाग में अध्यापक श्री अरुण पाण्डेय गुरु जी के सन्निधि मे रहकर श्रौत विषय का अध्ययन किया साथ में सामवेद के चूडान्त विद्वान् श्री गगनचट्टोपाध्याय गुरु जी से सामवेद का रहस्यान्त अध्ययन किया आपने सोमयाग में प्रस्तोता उद्गाता प्रभृति ऋत्विक् कार्य सम्पन्न किया है । वर्तमान में आप श्री काशी विश्वनाथ भगवान् के श्री चरणों के समाराधन में संलग्न होकर काशी में तपोमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

परमपूज्य पं० श्री निखिलशुक्ल घनपाठी (शुक्लयजुर्वेदनिर्देशकः )
संरक्षक

परमपूज्य पं० श्री निखिलशुक्ल घनपाठी (शुक्लयजुर्वेदनिर्देशकः )

श्री निखिलशुक्ल जी शुक्लयजुर्वेद माध्यन्दिन शाखा के घनान्त अध्येता हैं साथ ही ज्योतिष व्याकरण एवं श्रौत के चूडान्त विद्वान् हैं । आपकी अद्भुत प्रतिभा स्मरणशक्ति एवं अध्यापन कार्य मे रुचि अत्यन्त प्रशंसनीय है ।
आपका सरल स्वभाव आपकी विद्वता को और भी निखार देता है ।आपने सोमयाग में प्रतिप्रस्थाता आदि ऋत्विक् कार्य सम्पन्न किया है ।

परमपूज्य पं० श्री गोविन्दपौडेल ( शिक्षानिर्देशकः)
संरक्षक

परमपूज्य पं० श्री गोविन्दपौडेल ( शिक्षानिर्देशकः)

व्याकरण मीमांसा न्याय श्रौत आदि अनेक विषयों के पारावारीण विद्वान् श्री गोविन्द पौडेल जी के ऊपर परम पूज्य श्री ब्रह्मचारी गुरुजी का अत्यन्त वात्सल्य था । आप सविधि ब्रह्मचर्यपूर्वक वेदाध्ययन कर वर्तमान में काशी में अध्यापन कार्य में संलग्न हैं ।आपने अनेक सोमयागों में आर्त्विज्य किया । आपकी निश्छल एवं प्रसन्न प्रवृत्ति सबको आकर्षित करती है ।

परमपूज्य पं० श्रीपंकजपाण्डेयः (कार्य निर्देशकः)
संरक्षक

परमपूज्य पं० श्रीपंकजपाण्डेयः (कार्य निर्देशकः)

परमपूज्य पं० श्री अशोक गोड्से गुरुजी के प्रिय शिष्य पं० श्री पंकजपाण्डेय जी अत्यन्त उदारहृदय एवं श्रौत कर्म में अत्यन्त श्रद्धा रखते हैं ।आपने अनेक सोमयागों में आर्त्विज्य किया है। वर्तमान में श्रौत स्मार्त कर्म का प्रचार करते हुए श्री अयोध्या जी में निवास कर रहे हैं ।

परमपूज्य पं० श्री हरिओमशुक्ल (सचिव )
संरक्षक

परमपूज्य पं० श्री हरिओमशुक्ल (सचिव )

श्री हरिओमशुक्ल जी सामवेद के प्रख्यात विद्वान् परमपूज्य आचार्य श्री मुरलीकृष्ण श्रौती (चेन्नई)के प्रधान शिष्य परम विद्वान् परमपूज्य श्रीपाद जी से सामवेद का रहस्यान्त अध्ययन करके वर्तमान में भगवान् श्रीराम के सामवेद पूज्य आचार्य महर्षि वामदेव के दिव्य प्रांगण में स्थित श्री वामदेव सांग सामवेद पाठशाला में सामवेद का अध्यापन कर रहे हैं । आपका अत्यन्त विनम्र स्वभाव तथा अध्ययन अध्यापन में रुचि अत्यन्त प्रशंसनीय है ।

परमभक्त श्री सुदामादास जी ( गोसेवानिर्देशक)
संरक्षक

परमभक्त श्री सुदामादास जी ( गोसेवानिर्देशक)

वास्तव मे जिसके जीवन को पूर्णतया धन्य कहा जा सकता है वें हैं भक्तशिरोमणि श्रीसुदामा दासजी। गोप कुल में उत्पन्न श्री सुदामा दास जी ने अपनी सेवा से श्री ब्रह्मचारीगुरु जी को प्रसन्न कर चारो पुरुषार्थ अपने वश में कर लिया । आपने परमपूज्य श्री गुरुदेव भगवान् से रामायण रामचरितमानस आदि गन्थों का सविधि अध्ययन किया है । वर्तमान में आप गो ब्राह्मण की सेवा करते हुए भगवान् श्रीरामचन्द्र के श्रीचरणों में आसक्त हो अयोध्या जी में अत्यन्त तपोमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।